गुरुवार, 8 मई 2014

            आखिर तुम कौन ?

 
 
ये इंसान ,क्यूँ  बन रहे हो शैतान 
घोट इंसानियत का गला 
किसका कर रहे हो भला 
चारों ओर फैली  है साम्प्रदायिकता की आग 
हाथों में ले निकले हो खड्ग 
पूछो अपने आप से 
किसको मारोगो ?
हिंदू  मुस्लिम को ,मुस्लिम हिन्दु को 
क्या इससे पाओगे ?
लगा कालिख मुख पर 
किस ईश को मुख दिखलाओगे 
करूण विलाप कर्णों में गूँजेगी 
एक विधवा यहीं पूछेंगी 
आखिर तुम कौन हो?
इंसान या शैतान 
सोच में पड़ जाओगे 
अपने पर ही शर्माओगे 
ले अल्लाह ,भगवान का नाम 
ले रहे हो इन्तक़ाम 
सोचिए ज़रा, ईश को क्या बताओगे ?
काली करतूतों  को कैसे सुनाओगे 
 

रविवार, 4 मई 2014

                         सांप्रदायिक हिंसा 

सांप्रदायिक  हिंसा बहाती है लहूँ , रंग देती  है धरा 
नहीं पहचानते है लोग ,भूल जाते हैं भाई -चारा 
कैसे वो लोग हैं ,जो अपनो पर उठाते हैं तलवार 
मानव नहीं दानव हैं ,ऐसे लोगों को है धिक्कार 
 
हो जाती हैं विधवा ,हो जाते हैं अनाथ हजारों 
देख कर नहीं पिघलता निष्ठुर हृदय,हिंषक मक्कारों 
 ये मासूम बेसहारे बच्चे क्या किए तुम्हारा 
कुछ नहीं !फिर  किए  इन्हें अनाथ बेसहारा 
 
जाति ,धर्म ,संप्रदाय है कष्टों का कारण 
त्याग दो ,यहीं है सच्चा निवारण 
मानव मानव के लिए ,यहीं सच्चा धर्म हो 
सुख -दुःख में साथ रहें ,यही सच्चा कर्म  हो 

                    

                               लाश पर रोटियाँ 

लाश पर रोटियाँ सकता मानव
स्वार्थ सिद्धि के लिए बन गया है दानव 
क्या रिश्ते क्या नाते नहीं है पहचानता 
स्वार्थ सिद्धि को सब कुछ है मानता 
 
बह   रही हैं ख़ून की नदियाँ हज़ारों  रोज़ 
लुट रही हैं अस्मिता बालाओं की हर रोज़ 
सिर्फ़ अर्थ की ही हो रही है खोज
धनार्थ  मानव बन गया दानव आज़ 
 
लाश की अवशेष होती हैं हड्डियाँ 
पीस कर बनती हैं खाद की बोरियाँ 
हड्डियों को पीसने मेन में  आती लाज़ 
क्या करे? मज़बूर मानव आज़ 
 

शनिवार, 3 मई 2014

  

              गाँव 

छोड़ शहर की  गंदी छाया -माया,
पाने को प्रकृति की सुन्दर छाँव 
पकड़ा पथ जो जाती   गाँव 
नहीं  मिला पहले जैसा भाव 
चौड़ी-चौड़ी गालियाँ सँकरी 
हाव -भाव से लगते जैसे शहरी 
बरबस भव मन में उमड़े 
थोड़ी सी धूल  उड़े 
नहीं मिला जब ,मन व्यथित हुआ 
तब से  तन को समीर का  झोंका छुआ 
उड़  थे पॉलिथीन के कचड़े 
मुझे दिखे कुछ ग्रामीण  तन से अकड़े 
हाथों में सुन्दर कुत्ते,सिकड़े  से जकड़े 
सिमटे -सिमटे से खेत बाग़                                                       विवेक वीरेंद्र पाठक 
चहुँ दिश शहरीकरण की  आग 
चहुँ दिश गाड़ी मोटर की धूल 
मुरझाए -मुरझाए से कनेर के फूल 
पत्तियाँ दिख रही थी जैसे शूल 
लगता था जैसे मैं गया ग्राम पथ भूल 
मानस पटल पर उभरने लगी स्मृतियाँ 
याद आने लगी गाँव की पुरानी गलियाँ 
सुन्दर सी गाँव की अमराई 
साँझ पहर द्वार पर चारपाई
द्वार पर हरित नीम का पेड़ 
विहगों के सुन्दर से नीड़ 
बबुआ भइया की लुप्त पुकार 
नहीं मिला कहीं संयुक्त पुकार 
भाई-चारे ,अखंडता के भाव 
खंडित हो पनपे थे दुर्भाव 

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

JEEWAN PATH

जीवन पथ 

                      (१ )
जीवन पथ पर मिलते ,संग चलते ,कुछ बिछुड़ जाते हैं 
कभी सज्जन ,कभी दुर्जन मिलते ,साथ छोड़ जाते हैं 
न होता बिछुड़े का  वियोग ,हो जाता  नव संयोग 
अन्तःस्थल से आती  आवाज ,गाते  रहो नवजीवन  का राग 
हमेशा ख़ुशी,खुश ही रहो ,कभी आने न दो गम 
चलना है जीवन ,चलते  ही रहो,जीवन में लाओ नव उमंग 
          कभी समतल ,कभी ऊबड़ -खाबड़ पग मिलते ,फिर भी चलते  
          लड़खड़ाए फिर ब्भी  चलें ,निश्चित लक्ष्य हैं  मिलते 
          आराम है हराम ,जब तक नहीं मिलता  विराम 
          सच्चे अर्थों  में यहीं है जीवन का नाम 
                     (२)
इरादे यदि हैं बुलंद ,लक्ष्य के प्रति है समर्पण मन में 
दुर्बोध परिश्रम से उलटफेर  कर दोगे प्रारब्ध में 
धरा पर कोई नहीं रोक सकता ,जुटे रहो यदि श्रम से 
निश्चित लक्ष्य हैं  मिलते ,खुश हो जायेगा ईश  तुमसे 
                (३)
लक्ष्य के प्रति समर्पण रहा ,जो एवरेस्ट पर पहुँचे 
नहीं था जिनका सच्चा  ,समर्पण टपक आए नीचे 
जिंदगी में    कुछ  भी असंभव नहीं रह गया आज 
ठान यदि मन में लिया है ,कर लोगे हर काज 
          

 

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

एक छोटी सी  बच्ची

एक छोटी सी  बच्ची
उम्र बड़ी  है  कच्ची 
कभी सोती,कभी जगती
कुछ पल जागती ,फिर सोती 
 अनजानी  है इस जग से 
बेगानी हो जाएगी इस घर से
 एक छोटी सी बच्ची 
जब बन जाएगी स्त्री 
चढ़ेंगी दहेज़  की बलि बेदी पर 
करेगी आत्मसमर्पण जीवनभर 
नहीं पता धान की पौध है  
एक खेत वीरान 
दूसरे में हरियाली होगी 
कष्टों की शहनाई होगी 
पैरों में बड़ी होगी 
जब बच्ची एक स्त्री होगी

रविवार, 20 अप्रैल 2014

हार  मैं  मानता  नहीं
मुश्किलों से भागता नहीं
जिंदगी एक रंगमंच
नहीं मुझे किसी  रंज